चाणक्य नीति • अध्याय 1 • श्लोक 2
चाणक्य नीति अध्याय 1 श्लोक 2
शत्रोरपि गुणा ग्राह्या दोषा त्याज्या गुरोरपि।
सरल हिंदी अर्थ
शत्रु के भी अच्छे गुण ग्रहण करने चाहिए और गुरु के दोष भी त्याग देने चाहिए।
जीवन में इसका अर्थ
किसी भी व्यक्ति से — मित्र हो या प्रतिस्पर्धी — अच्छाई सीखने की खुली सोच रखें, और अंधानुकरण से सदैव बचें। विवेक ही सच्ची नीति है।
ॐ असतो मा सद्गमयतमसो मा ज्योतिर्गमयसत्यमेव जयतेवासुधैव कुटुम्बकम्कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचनसर्वे भवन्तु सुखिनःसर्वे सन्तु निरामयाः
